दिल की आवाज

प्यार के देवता राधा कृष्ण, फिर प्यार अपवित्र, प्यार करने वाले चरित्रहीन कैसे

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विराट लव गुरु ❤️

 

राधा कृष्ण को प्यार का प्रतीक कहा जाता है। हिन्दू समाज में न सिर्फ उनके प्यार की मिशाल दी जाती है बल्कि उन्हें भगवान मान कर पूजा जाता है। ताज्जुब होता है कि जिस समाज में प्रेम के प्रतीक राधा कृष्ण को भगवान मान कर पूजा जाता है। उसी समाज में प्रेम को बहुत ही गलत भाव से देखा जाता है। उसी समाज में प्रेम करने वालों को चरित्रहीन करार दे दिया जाता है। प्रेम की सजा मौत तक हो सकती है। अनेक उदाहरण देखे होंगे जिसमें प्रेम करने वाले या तो आत्महत्या कर लेते हैं अथवा उन्हें ऑनर किलिंग का शिकार बनना पड़ता है। आखिर पवित्र कहे जाने वाले प्रेम को लोग गंदी निगाह से क्यों देखने लगे यह समझने की बात है।

 

राधा व कृष्ण शादीशुदा होने के बावजूद एक दूसरे को अटूट प्रेम करते थे। उन्हीं राधा कृष्ण को पूजने वाला समाज विवाहेत्तर संबंधों को नाजायज कहता है। फिर राधा कृष्ण का प्रेम पवित्र कैसे हुआ। उनके रिश्ते को नाजायज नाम क्यों नहीं दिया गया। उनके प्यार को क्यों पवित्र व पूज्य कहा जाता है। आज हर मंदिर में कृष्ण के साथ राधा की प्रतिमा अथवा तस्वीर क्यों होती है। क्यों नहीं कृष्ण के साथ उनकी पत्नी व राधा के साथ उनके पति की प्रतिमा लगाई जाती है।

 

इन सारे सवालों का एक जवाब ही जवाब है, शक्ति व समर्पण। राधा कृष्ण के बीच एक दूसरे के लिए समर्पण था। भले ही उनका वैवाहिक जीवन अलग रहा हो किन्तु दोनों एक जिस्म एक जान रहे। उनके प्यार को यदि गौर से समझा जाए तो उन्होंने सामाजिक रीतिरिवाजों व बंधनों से अलग प्यार को महत्व दिया है। उन्होंने प्यार किया तो डंके की चोट पर उसे स्वीकार भी किया। क्योंकि उनका प्रेम सच्चा था इस लिए उन्हें किसी से छिपाने अथवा डरने की जरूरत नहीं हुई। दूसरी वजह थी उनके प्रेम में वह शक्ति जो दुनियां को अपने सामने झुका ले। जब आप दुनियां की परवाह करते हैं तब तक आप पर उंगलियां उठाईं जातीं हैं। जैसे ही आप दुनियां को अपने ठेंगे पर रख दें वहीं उंगलियां उठाने वाले आप के गुणगान करने लगते हैं।

 

आज लोग राधा कृष्ण तो बनना चाहते हैं पर उनकी तरह कितने लोग हैं जो प्यार करते हैं। पहली बात तो आज अधिकांश मामलों में शारीरिक संतुष्टि अथवा मन बहलाने को प्रेम का नाम दे दिया जाता है। ़एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए उसे प्रेम का नाम दे दिया। ऐसे प्रेम में न पवित्रता होती है, न समर्पण न ही उसे निभाने की हिम्मत। प्रेमी प्रेमिका चोरी छिपे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहते हैं। और इसको नाम देते हैं प्रेम का। दो व्यक्तियों के बीच यदि एक आवश्यकता पूर्ति के लिए जुड़ा है और दूसरा सच में प्रेम करता है फिर क्या होगा। एक दिन दूसरी जगह से आवश्यकता की पूर्ति होने पर वह व्यक्ति तो साथ छोड़ देगा। पर जो सच में प्यार करता है वह तो मर ही जाएगा न। ऐसे लोग ही प्रेम को कलंकित करते हैं। प्यार को समाज में गंदा साबित करते हैं।

 

यदि दो लोगों के बीच पवित्र व सच्चा प्रेम है, यदि उनके प्रेम में एक दूसरे के लिए समर्पण है। फिर उस प्रेम को दुनियां की कोई ताकत जुदा नहीं कर सकती। उनमें साक्षात देवी राधा व भगवान श्रीकृष्ण विराजमान हो जाते हैं। यदि प्रेम सच्चा है, समर्पण है तो उसे झुकना क्यों। वह तो पूरी दुनियां से टकराने में भी पीछे नहीं हटेगा। दुनियां से टकराने का मतलब एक साथ रहने के लिए नहीं है। प्रेम में कभी एक साथ रहने की आवश्यकता नहीं होती। शादी करना व एक साथ रहना तो स्वार्थ्य हुआ न। यदि सच्चा प्रेम है तो दो लोग दूर होते हुए भी हर वक्त एक साथ रह सकते हैं। एक को तकलीफ हो तो दूसरे को एहसास होता है। एक दूसरे की खुशी के लिए दुनियां से टकराते हैं सच्चे प्रेमी। न की एक साथ रहने व मौज मस्ती के लिए। भगवान श्री कृष्ण ने दुनियां को इसी पवित्र प्रेम का पाठ पढ़ाया है। जिससे लोग उन्हें मंदिरों में बैठा कर पूजते हैं। आज उन्हें पूजने वाले, उन्हें प्रेम का आदर्श मानने वाले कितने लोग हैं जो उनकी तरह प्रेम करते व निभाते हों।

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