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करवाचौथ; पति के लिए लंबी उम्र और खुद के लिए मौत, महानता या मानसिक गुलामी

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Virat News Nation

माधव द्विवेदी, प्रधान संपादक ।

 

“पति की लंबी उम्र के लिए व्रत करने वाली नारी खुद के लिए सुहागिन मौत मांगती है, इसे महानता कहेंगे या मानसिक गुलामी”

 

रात करीब साढ़े 10 बजे ऑफिस से घर पहुंचा। चाय की चुस्की लेते हुए अचानक टीवी में चल रहे सीरियल पर नजर पड़ी। जिसमें जेल में बन्द एक महिला करवाचौथ का पूजन कर रही है। जेल के अंदर ही उसका पति पहुंच कर विधि विधान से अपनी पूजा कराता है। बैकग्राउंड में अजीब सा गाना भी बज रहा था। अब यह बात अलग है कि यदि यह सीरियल न होता तो उस पति की कायदे से पूजा हो जाती। अचानक से मेरे मन में उत्सुकता हुई कि आखिर पता किया जाए इस करवा चौथ की कथा क्या है।

 

 

ऐसा नहीं है कि पहली बार करवा चौथ देखा हो। अपने घर में करवाचौथ की पूजा देखी है। साथ सोशल मीडिया पर पति पत्नी के अजीब हरकतों वाले डिजायनर फोटो व वीडियो भी देखे हैं। बस इस बार करवाचौथ की कथा जानने की उत्सुकता बढ़ी की आखिर क्या खास है इसमें जो यह पर्व दिन पर दिन डिजायनर होता जा रहा है। तो साहब हमने सहारा लिया गूगल बाबा का। कुछ भी जानने के लिए आज गूगल ज्ञानी पर्याप्त हैं। करवा चौथ सर्च करने पर यह देख कर चौंक गया कि एक ही व्रत के लिए अलग अलग तरह की कथाएँ चल रहीं हैं। हर कथा में स्त्री को धर्म के नाम पर या तो डराया गया या झाड़ पर ही चढ़ा दिया।

 

 

खैर हमें तो इस व्रत के बारे में जानना था, तो जिस कथा को सबसे ज्यादा देखा गया हम उसी पर चले गए। आगे लिखने से पहले कथा का सार बताना आवश्यक है जो इस प्रकार है। तुंगभद्रा नदी के किनारे करवा नाम की महिला अपने पति के साथ रहती थी। उसके पति को स्नान करते वक्त मगरमच्छ ने पकड़ लिया। बेचारे पति ने मदद के लिए पत्नी को पुकारा। मौके पर पहुंची करवा ने मगरमच्छ को कच्चे सूते (धागे) से पेड़ से बांध यमराज से पति को जीवन देने और मगरमच्छ को मौत देने की मांग की। जब यमराज ने विधि का विधान बदलने की बात कही तो करवा ने नाराज होकर यमराज को शॉप देने की धमकी दी। जिसके बाद यमराज डर गए और करवा की बात मान ली।

 

 

कथा का सार यह निकला कि एक महिला ने अदम्य साहस दिखाते हुए अपने पति की रक्षा की, उसके प्राण बचाये। यही कुछ सत्यवान-सावित्री की कथा में भी देखने को मिलता है। जिसके लिए भी स्त्रियों को बट सावित्री व्रत रखने की नसीहत दी जाती है। शायद उस व्रत में पति की उम्र बढ़ने का रिस्क होने पर करवाचौथ बनाया गया है। अब मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि जिसके प्राण बचे उसे व्रत रह कर अपने प्राण बचाने वाले कि पूजा करनी चाहिए, उसके पैर धोकर पीने चाहिए न। फिर यह उल्टी गंगा क्यों, कि प्राण बचाने वाली खुद ही भूखी प्यासी रहे और उस निकम्मे की पूजा करे जो अपनी खुद की रक्षा करने में भी सक्षम न हो।

 

 

दरसल यह सभी व्रत-पूजन पुरुष सोच द्वारा औरतों की मानसिक गुलामी की कड़ी मजबूत करने का ही अहम हिस्सा हैं। हमारे समाज में पति की लंबी उम्र (करवाचौथ), बेटों की लंबी उम्र (संतान सप्तमी), घर में धन वैभव (वैभव लक्ष्मी) व खुशहाली (गणेश चौथ) आदि के लिए व्रत रखने के सारे टेंडर औरतों को दिए गए हैं। जिनके लिए बाकायदा कथाएं बनायीं गयीं हैं। यहां तक की मासिक धर्म जैसे सामान्य चक्र को दोष बताते हुए उसके दोष निवारण के लिए भी एक व्रत (ऋषि पंचमी) तय कर दिया गया है। वहीं इस सब से पुरुषों को आजाद रखा गया है। पुरुष मानसिकता द्वारा तय की गई इस मानसिक गुलामी को आज की आधुनिक नारी भी बहुत ही खुशी से ढो रही है। इसे निर्लज्जता की पराकाष्ठा ही कहेंगे की परिवार व पुरुषों की सलामती के लिए भूखी प्यासी रहने वाली नारी हर शुभ मौके पर अपने लिए मौत (में सुहागन मरूं) मांगती है।

 

 

में किसी परंपरा का विरोधी नहीं हूं, मेरा सवाल बस इतना है कि आखिर यह सभी परंपराएं सिर्फ औरत के लिए ही क्यों। जब हमारी संस्कृति में आदमी और औरत को एक दूसरे का पूरक बनाया गया है, फिर सबकी लंबी उम्र मांगने वाली हर शुभ अवसर पर अपने लिए पति से पहले मौत क्यों माँगती है। नारी के लिए पुरुष से पहले मौत की कामना करना क्या मानसिक गुलामी नहीं है। क्या यह उसके जीवन के अधिकार का पुरुष द्वारा हरण नहीं है। आखिर पति द्वारा अपनी पत्नी अथवा बेटे द्वारा अपनी मां की सलामती के लिए कोई व्रत क्यों नहीं रखा जाता। फिर एक औरत आखिर क्या अहमियत रखती है इस समाज में। क्या अहमियत है एक स्त्री की उसके ही घर परिवार में जिसे संवारने सजाने में वह खुद की खुशियों को दफन कर देती है।

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